एकजुटता का रंग: वरिष्ठ नेताओं के बीच टिकट बंटवारे के बाद दिखी एकजुटता ने कांग्रेस की जीत में अहम भूमिका निभाई, जिससे UDF सरकार बनाने की स्थिति में है।
युवा और अनुभवी नेतृत्व: वैचारिक बदलाव और कांग्रेस के सीनियर नेताओं के एकजुट प्रयासों के कारण पार्टी ने राज्य में अपनी सत्ता फिर से हासिल की है।
त्रिशूर, आरनमुला, कुन्नाथुनाड, पथानामथिट्टा व कोट्टायम जैसी सीटों वाला मध्य केरलम एक बार फिर मुख्य चुनावी अखाड़े के तौर पर उभरा। इनमें से कई सीटों पर कांग्रेस ने जीत हासिल की। ऐसे में यूडीएफ के पीछे ईसाई वोटों का एकजुट होना इस गठबंधन की वापसी का एक बड़ा कारण रहा।
कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) ने केरलम में एक दशक बाद सत्ता में जबरदस्त वापसी की है। यूडीएफ में कांग्रेस, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल), केरल कांग्रेस (केईसी) और रिवोल्यूशनरी मार्क्सवादी पार्टी ऑफ इंडिया (आरएमपीआई) शामिल हैं। यूडीएफ की जीत की मुख्य वजहें कांग्रेस में आंतरिक एकजुटता कायम रखना, सत्ता विरोधी लहर और सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। यूडीएफ ने इस चुनाव में 60 फीसदी मतों के साथ 102 सीटें जीतीं।
सत्ता विरोधी लहर : यूडीएफ की जीत के पीछे काफी हद तक 2016 से लगातार सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के प्रति जनता का गुस्सा है। शासन-प्रशासन, आर्थिक दबाव और राजनीतिक अहंकार के आरोपों को लेकर बढ़ती चिंताओं ने इस आम धारणा को और मजबूत किया कि एलडीएफ लंबे समय तक सत्ता में रहने के बोझ तले दब गया है। राज्य की राजनीति में सत्ता विरोधी लहर निर्णायक भूमिका निभाती रही है। मतदाताओं ने अक्सर बदलाव को प्राथमिकता दी है। इसके चलते सरकारें एक या दो कार्यकाल से अधिक सत्ता में बने रहने के लिए संघर्ष करती रही हैं। यह पैटर्न आंकड़ों में साफ दिखता है। 2001 में यूडीएफ 100 सीटें जीतकर सत्ता में आई, जबकि एलडीएफ को 41 सीटें िमली थीं। पांच साल बाद 2006 में एलडीएफ ने 102 सीटें जीतकर सत्ता में जोरदार वापसी की। हालांकि 2011 में, उसकी सीटें फिर तेजी से गिरकर 70 रह गईं। ये उतार-चढ़ाव केरल के सत्ता-विरोधी चक्र को दर्शाते हैं।









