सबसे बड़े नक्सली लीडर देवजी ने तेलंगाना DGP के सामने किया सरेंडर

Top Naxalite leader Devji surrenders before Telangana DGP

हैदराबाद,24फरवरी । नक्सलवाद के खिलाफ चल रहे अभियान में सुरक्षा एजेंसियों को बड़ी सफलता मिली है। प्रतिबंधित संगठन CPI (माओवादी) के शीर्ष नेता थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देव जी ने अपने चार साथियों के साथ तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक (DGP) के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इसे 31 मार्च 2026 से पहले नक्सल मोर्चे पर अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जा रहा है।

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार देव जी संगठन में महासचिव स्तर तक पहुंचने वाले वरिष्ठ नेताओं में शामिल था। मई 2025 में नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजु के मारे जाने के बाद सितंबर 2025 में उसे संगठन का महासचिव नियुक्त किया गया था।

कौन है देव जी?
करीब 60 वर्षीय थिप्पिरी तिरुपति मूल रूप से तेलंगाना (पूर्व आंध्र प्रदेश) के करीमनगर जिले का निवासी बताया जाता है। इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान वह कट्टरपंथी छात्र संगठन से जुड़ा और बाद में भूमिगत माओवादी गतिविधियों में शामिल हो गया। अपनी रणनीतिक क्षमता और संगठनात्मक कौशल के चलते वह मिलिट्री इंटेलिजेंस विंग का प्रमुख बना, फिर सेंट्रल मिलिट्री कमीशन का इंचार्ज और पोलित ब्यूरो सदस्य के रूप में शीर्ष नेतृत्व में शामिल हुआ।

सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि देव जी उर्फ देवअन्ना, चेतन, संजीव और सुधर्शन जैसे कई नामों से सक्रिय रहा। वह छत्तीसगढ़ के चर्चित झीरम घाटी कांड समेत कई बड़े एंबुश और आईईडी हमलों की रणनीति से जुड़ा रहा है। विभिन्न राज्यों में उस पर 1 से 2 करोड़ रुपये तक का इनाम घोषित था।

ऑपरेशन “कगार” का असर

बताया जा रहा है कि करेंगुट्टा क्षेत्र में चलाए गए संयुक्त ऑपरेशन “कगार” के दबाव में संगठन बुरी तरह कमजोर हुआ। लगातार अभियान, खुफिया कार्रवाई और घेराबंदी के चलते शीर्ष नेतृत्व पर दबाव बढ़ा, जिसके बाद आत्मसमर्पण का फैसला लिया गया। इसके अलावा माओवादी संग्राम नामक एक अन्य नेता के भी हथियार डालने की खबर है।

सरकार का दावा: नक्सलवाद अंतिम चरण में
छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा ने कहा कि नक्सलियों का बड़ा धड़ा ढह चुका है और बचे हुए उग्रवादी भी अब सक्रिय नहीं हैं। उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों का अभियान तेज गति से जारी है और सशस्त्र नक्सलवाद अपने अंतिम चरण में है। सरकार ने शेष उग्रवादियों से मुख्यधारा में लौटने और पुनर्वास का अवसर लेने की अपील की है।

आगे क्या?
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शीर्ष नेतृत्व के सरेंडर से संगठन की संरचना और संचालन पर गहरा असर पड़ेगा। इससे अन्य कैडरों के आत्मसमर्पण की संभावना भी बढ़ सकती है। 31 मार्च 2026 से पहले इसे सुरक्षाबलों की रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक दोनों दृष्टि से बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।