नई दिल्ली ,14 मार्च । सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कामकाजी महिलाओं और छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान अनिवार्य छुट्टी देने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि पीरियड्स के दौरान छुट्टी को कानूनन अनिवार्य बनाने से महिलाओं के रोजगार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसा कानून बनाया जाता है तो नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि इससे कामकाजी महिलाओं के मन में यह धारणा पैदा हो सकती है कि वे पुरुषों से कमतर हैं।
यह टिप्पणी उस समय आई जब अदालत वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका पर विचार कर रही थी। याचिका में राज्यों को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के लिए पीरियड्स के दौरान छुट्टी का नियम बनाएं।
कोर्ट ने कहा कि जागरूकता और संवेदनशीलता बढ़ाना अलग बात है, लेकिन इसे कानूनन अनिवार्य बनाने से उल्टा असर हो सकता है। अदालत के अनुसार, कई संस्थान और निजी कंपनियां स्वैच्छिक रूप से ऐसी सुविधाएं देती हैं, लेकिन इसे अनिवार्य कानून बनाने से रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता एम.आर. शमशाद ने बताया कि केरल सरकार ने 2013 में राज्य के विश्वविद्यालयों में छात्राओं के लिए पीरियड लीव की व्यवस्था शुरू की थी।
गौरतलब है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वच्छता को महिलाओं और लड़कियों के जीवन, गरिमा, स्वास्थ्य और शिक्षा के अधिकार से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताया था और सरकारों को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन, अलग शौचालय और जागरूकता अभियान सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए थे।








