कांकेर 18 फरवरी 2026। मुख्यमंत्री सामूहिक कन्या विवाह योजना के अंतर्गत 10 फरवरी को गोविंदपुर में आयोजित सामूहिक विवाह समारोह अब विवादों में घिर गया है। समारोह में शामिल एक जोड़े पर पहले से विवाहित होने के बावजूद योजना का लाभ लेने का आरोप लगा है। सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों के बाद यह कथित फर्जीवाड़ा सामने आया, जिसने योजना के सत्यापन तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत प्रेमनगर निवासी सुदीप विश्वास और ग्राम पीवी 64 निवासी स्वर्णा मिस्त्री ने करीब आठ महीने पहले, 3 जून 2025 को सामाजिक रीति-रिवाजों के तहत विवाह किया था। ग्रामीणों के मुताबिक, विवाह के बाद युवती अपने पति के घर में रह रही थी। इसके बावजूद इस जोड़े का नाम मुख्यमंत्री सामूहिक कन्या विवाह योजना में पंजीकृत कर दिया गया और उन्होंने समारोह में भाग लेकर योजना का लाभ प्राप्त कर लिया।
मामले के उजागर होने के बाद सत्यापन प्रक्रिया को लेकर कई गंभीर विसंगतियां सामने आई हैं। बताया जा रहा है कि आवेदन सेक्टर हरनगढ़ से किया गया था, जबकि योजना के स्पष्ट नियमों के अनुसार आवेदन वधू पक्ष की क्षेत्रीय स्थानीय आंगनबाड़ी केंद्र के माध्यम से होना अनिवार्य है। इस नियम की अनदेखी करते हुए आवेदन स्वीकार कर लिया गया, जो प्रशासनिक लापरवाही का संकेत देता है।
आरोप है कि संबंधित आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सेक्टर सुपरवाइजर ने बिना किसी गहन जांच या सत्यापन के आवेदन को मंजूरी दे दी। पंचायत स्तर से अविवाहित होने का प्रमाण पत्र भी प्रस्तुत किया गया, लेकिन वास्तविक वैवाहिक स्थिति की पुष्टि नहीं की गई। इस पूरी प्रक्रिया में तथ्यों की जांच के बजाय औपचारिकताओं तक ही सीमित रहने की बात सामने आई है।
सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों ने पूरे मामले को उजागर करने में अहम भूमिका निभाई। तस्वीरों में वर-वधू सिंदूर और बंगाली रीति-रिवाज के अनुसार ‘पोला’ पहने हुए दिखाई दिए, जो पारंपरिक रूप से विवाहित महिलाओं का प्रतीक माना जाता है। इन संकेतों ने लोगों के बीच संदेह पैदा किया, जिसके बाद मामले की चर्चा तेज हो गई।
मुख्यमंत्री सामूहिक कन्या विवाह योजना के तहत प्रत्येक जोड़े को कुल 50,000 रुपए की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। ऐसे में इस फर्जी पंजीकरण के कारण सरकारी राशि गलत हाथों में जाने का आरोप भी लग रहा है। यह घटना न केवल योजना की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि लाभार्थियों के चयन और सत्यापन की प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है।







