नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा की नई अलख : बंद पड़े 123 स्कूल फिर से गुलज़ार, ‘नियद नेल्लानार योजना’ से बदली तस्वीर

A new wave of education in Naxal-affected areas: 123 closed schools are back in business, with the 'Niyad Nellanar Scheme' transforming the landscape.

सुकमा के दूरस्थ क्षेत्रों में पिछले साल शुरू हुई 07 नवीन प्राथमिक शालाएं

सुकमा, 24 मार्च(वेदांत समाचार) । नक्सलवाद के काले साये को पीछे छोड़ते हुए छत्तीसगढ़ के अंदरूनी इलाकों में शिक्षा का उजाला एक बार फिर तेजी से फैल रहा है। शासन द्वारा जारी ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, सलवा जुडूम आंदोलन के दौरान नक्सलियों के दहशत से बंद हुए सुकमा जिले के सैकड़ों स्कूलों के दरवाज़े अब बच्चों के लिए पूरी तरह खुल चुके हैं, और छत्तीसगढ़ सरकार की नियद नेल्लानार योजना से शिक्षा व्यवस्था को नई मज़बूती मिल रही है।

पुनर्जीवित हुई शिक्षा व्यवस्था
दस्तावेज़ के मुताबिक, वर्ष 2006 में माओवादी प्रभाव और सलवा जुडूम आंदोलन के कारण कुल 123 स्कूल बंद हो गए थे। इनमें 101 प्राथमिक और 21 माध्यमिक शालाएं शामिल थीं। प्रशासन के निरंतर प्रयासों से इन सभी स्कूलों को पुनः प्रारंभ कर दिया गया है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वर्तमान में ऐसे स्कूलों की संख्या शून्य है, जो पूर्व में माओवादी प्रभाव के कारण बंद थे।

प्रमुख उपलब्धियां और बुनियादी ढांचा
शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और दूरस्थ इलाकों के छात्रों के भविष्य को देखते हुए आवासीय विद्यालयों और छात्रावासों का जाल बिछाया गया है। पोटा केबिन (आवासीय विद्यालय) वर्तमान में 16 पोटा केबिन संचालित हैं, जिनमें 6,722 छात्र दर्ज हैं।
छात्रावास सुविधा 16 पोटा केबिन छात्रावासों में 1,389 विद्यार्थी रहकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय टाइप-3 (कक्षा 6वीं से 12वीं) के 3 विद्यालयों में 600 छात्राएं और टाइप-4 (कक्षा 9वीं से 12वीं) के 2 छात्रावासों में 200 छात्राएं लाभान्वित हो रही हैं।

नियद नेल्लानार योजना से नई शुरुआत
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में वर्ष 2024-25 में विकास की गति को और तेज करते हुए नियद नेल्लानार योजना के अंतर्गत शामिल गांवों में 07 नवीन प्राथमिक शालाएं खोली गई हैं। इन स्कूलों में अब तक 210 बच्चों ने प्रवेश लिया है। भविष्य की कार्ययोजना को देखते हुए प्रशासन ने 19 और नए स्कूल खोलने का प्रस्ताव तैयार किया है। जमीनी स्तर पर आ रहे ये बदलाव न केवल बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं, बल्कि इन क्षेत्रों में विश्वास की एक नई किरण भी जगा रहे हैं। शासन ने ‘पहले’ और ‘अब’ की तस्वीरों के साथ विकास के इस परिवर्तन को प्रमाणित भी किया है, जो स्पष्ट करता है कि बंदूक की गूंज पर अब स्कूलों में बच्चों के ककहरा की गूंज और किताबों की सरसराहट भारी पड़ रही है।