किसी में अगर प्रतिभा हो तो उसे सुविधा नहीं मिलने के बाद भी वह निखर कर सामने आ ही जाती है। ऐसी ही एक प्रतिभा कोरबा जिले के दर्री अयोध्यापुरी वार्ड क्रमांक 52 में कुछ ऐसा ही देखने को मिला है जहां छोटे से मजदूर सतीश यादव के बेटे सूरज यादव ने सीजीपीएससी (CGPSC) एग्जाम क्रेक करके अपनी सफलता का डंका बजा दिया हैं
मिट्टी खपरा के घर में बीता जीवन माता-पिता ने अपने बेटे की सफलता की सीढ़ी तैयार की. आज सूरज यादव के कंधे पर डबल स्टार है. यह स्टार इनके माता-पिता और दादी के संघर्ष का तोहफा है.
आबकारी विभाग में सब इंस्पेक्टर बने सूरज:सूरज यादव छत्तीसगढ़ CGPSC 2024 में पूरे छत्तीसगढ़ में 87वाँ रैंक प्राप्त कर आबकारी विभाग में सब इंस्पेक्टर हैं. पहली पोस्टिंग कोरिया जिले में हुई है ,सूरज की सफलता से माता-पिता काफी खुश हैं
उनकी जुबानी संघर्ष की कहानी
घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पिता को कठिन परिश्रम करते देखा तो गरीबी दूर करने अधिकारी बनने का निश्चय बचपन से ही कर लिया था। गरीबी के कारण पढ़ाई में दिक्कतें आने पर मेरे सभी शिक्षकों ने भरपूर मदद की और आगे बढऩे के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया। प्रारंभिक शिक्षा अयोध्यापुरी के ही शासकीय स्कूलों में हुई है। कक्षा 11वी और 12वी के लिए विद्युत गृह उच्चतर माध्यमिक विद्यालय क्रमांक 2 दर्री में पूरा हुआ। मैंने अपना स्नातक की उपाधि EVPG कॉलेज कोरबा से BSC (maths) में 2020 में प्राप्त किया।
पारिवारिक पृष्ठभूमि:– मेरी दादी (राही यादव) घर-घर जाकर झाडू पोंछा बर्तन धोने के काम करती थी मेरे पिता डेली वेजेस पर काम करने वाले मजदूर हैं।
प्रेरणा मुख्यतः मेरी माता ही रही हैं। उन्होंने मेरे बचपन से ही उस माहौल में मेरे पढ़ाई पर ध्यान दिया जहां पढ़ाई असंभव था। हर विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने हमेशा हमारे भाई बहन के पढ़ाई आगे रखा। अपने एक समय का खाना ना खड़ेका पैसा बचाकर हमारे पढ़ाई में लग बाकी की चीज़ों को उन्होंने बहुत अच्छे से संभाला है। इसके अलावा pg College Korba के फिजिक्स के HOD श्री एस.एस. तिवारी जी ने मेरा काउंसलिंग किया जिससे मेरा रुझान second year में ही वनडे एग्जाम्स की ओर हुआ फिर कॉलेज के बाद सीजीपीएससी की ओर हुआ। इसके अतिरिक्त कोरबा कलेक्टर श्री रजत कुमार(2012–14) से काफ़ी प्राभावित हुआ था।
12 वीं उत्तीर्ण होने के बाद शिक्षाकर्मी नौकरी करते हुए आगे पढ़ाई जारी रखी। प्राइवेट छात्र के रूप में बीएससी और एमएससी गणित कर शिक्षाकर्मी वर्ग एक के रूप में बीजापुर और कबीरधाम में सेवाएं दी।
मेरा नाम सूरज यादव है पिता का नाम सतीश यादव, माता का नाम मंदाकिनी यादव है। मैंने CGPSC 2024 में पूरे छत्तीसगढ़ में 87वाँ रैंक आया है जिससे मुझे छत्तीसगढ़ आबकारी विभाग में उपनिरीक्षक का पद मिला है। वर्तमान में कोरिया जिले में पदस्थहूं।
मेरी प्रारंभिक शिक्षा अयोध्यापुरी के ही शासकीय स्कूलों में हुई है। कक्षा 11वी और 12वी के लिए विद्युत गृह उच्चतर माध्यमिक विद्यालय क्रमांक 2 दर्री में पूरा हुआ। मैंने अपना स्नातक की उपाधि EVPG कॉलेज कोरबा से BSC (maths) में 2020 में प्राप्त किया।
पारिवारिक पृष्ठभूमि:– मेरी दादी (राही यादव) पहले घरों में झाडू पोंछा बर्तन करने जाती थीं। मेरे पिता जी सतीश यादव डेली वेजेस पर काम करने वाले मजदूर हैं। माता जी गृहिणी हैं। मेरा छोटा भाई अभी MA फाइनल कर रहा है साथ ही साथ घर की ज़िम्मेदारी में हाथ बटाने के लिए आस पास के बच्चों को ट्यूशन देता है। मेरी बहन डॉली यादव अभी कक्षा 11 में पढ़ रही है। सभी का अनकंडीशनल सपोर्ट रहा। विशेषतः मेरी माता जी का जिन्होंने कभी मुझे ये महसूस नहीं होने दिया कि हम अभाव में हैं। सभी गुरुजनों का मार्गदर्शन भी सतत प्राप्त होता रहा।
प्रेरणा:–
मेरी CGPSC की यात्रा ग्रेजुएशन के बाद 2020 से ग्रेजुएशन के बाद शुरू होती है। मैंने कोरोना समय 2021 में ऑनलाइन कोर्स लिया था हालांकि कुछ कारणों उसे पढ़ नहीं पाया। उस टाईम मन भी वैसा नहीं हुआ की पढ़ लूं। Cgpsc 2021 मेरा पहला अटेंप्ट था। मेरा प्रीलिम्स ही क्लीयर नहीं हुआ। उसके बाद जिला प्रशासन कोरबा ने निःशुल्क कोचिंग संस्थान की शुरुआत की जिसमें मेरा सिलेक्शन हो गया था। मैंने वहां जाकर लगातार टेस्ट दिया। जिससे cgpsc 2022 और 2023 में मेरा प्रीलिम्स क्लियर हो गया लेकिन मैंस क्लियर नहीं हो पाया। 2023 में मैंस क्लियर नहीं होना मेरे लिए बहुत बड़ा सेटबैक था। क्योंकि इस बार मैंने ख़ुद को पूरा झोंक दिया है। हमारे समय परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी 3 attempt लगातार फेल होना दबाव और तनाव भरा रहा। इसके बाद मैंने व्यापम के भी एग्जाम्स गंभीरता से दिलाना शुरू किया। वनडे एग्जाम्स में पकड़ अच्छी हो गई थी इसी के फलस्वरूप हॉस्टल सुप्रिटेंडेंट के एग्जाम में 142(0.02 मार्क्स से सिलेक्शन चुका), मंडी बोर्ड सचिव के एग्जाम में लगभग 300 रैंक था। हालांकि दोनों में सिलेक्शन नहीं हुआ। घर की ज़िम्मेदारी मेरे छोटे भाई सागर यादव ने उठाई।2022–23 से उसने ट्यूशन पढ़ना शुरू किया इससे मेरे ऊपर जो रोज़गार का दबाव था वह बहुत हद तक कम हुआ। 2025 के आते आते मुझे लगने लगा की जॉब करना ही पड़ेगा। इसी दबाव के साथ CGPSC 2024 का प्रीलिम्स दिया क्लियर हुआ, मैंस दिया, यह पिछले 2 attempts से मेरे गले की हड्डी थी, इस बार जून में मैंस के बाद मैंने कितने नंबर आ जायेंगे/क्या स्तर था आदि का एनालिसिस ही नहीं किया और रिज़ल्ट का इंतज़ार करने लगा। इसी बीच अयोध्यापुरी के ही मिडिल स्कूल में मानदेय शिक्षक के लिए अप्लाई कर दिया। साथ ही साथ मिड 2025 में उच्च शिक्षा विभाग में प्रयोगशाला परिचारक और आबकारी आरक्षक के लिए व्यापम में एग्जाम भी दिलाया था जो कि अच्छा गया था। मानदेय शिक्षक के लिए बुलावा आया मैंने ज्वाइन नहीं किया, क्योंकि व्यापम में हो जायेगा ऐसी उम्मीद थी। व्यापम के एग्जाम्स का रिज़ल्ट आया पहले प्रयोगशाला परिचारक में 42 और दूसरे ही दिन आबकारी आरक्षक में 44वाँ रैंक आया। दोनों सरकारी जॉब में सिलेक्शन निश्चित था। घर में खुशी का माहौल था।लेकिन मुझे मैंस के रिज़ल्ट का इंतजार था। मैंस का रिज़ल्ट भी अक्टूबर के अंत में आया और मेरा पहली बार मैंस भी क्लियर हुआ था। 10–15 दिन बाद ही interview था। 20 नवम्बर 2025 को Cgpsc 2024 का मेरिट लिस्ट आया जिसमें 87वे नंबर पर मेरा नाम और डेट ऑफ़ बर्थ था। सिलेक्शन इसमें भी फिक्स था लेकिन कौनसा पोस्ट मिला है यह अगले दिन 21 नवंबर को पता चला। मुझे आबकारी उपनिरीक्षक का पोस्ट अलॉट हुआ। घर में खुशी का माहौल था। वर्षो के संघर्ष का अंत हुआ था सबके आंखो में खुशी के आंसू थे। मेरी मां के दृश्य/अदृश्य सभी संघर्षों का अंत था। उनके वर्षों के त्यागों का परिणाम 20 नवंबर को देर से लेकिन लेकिन बहुत सुसज्जित से मिला।
मैंने लगभग पूरी तैयारी सेल्फ स्टडी और कुछ गुरुजनों के मार्गदर्शन से किया। टेलीग्राम एप में पूर्व में चयनित अधिकारियों से सतत जुड़ाव रहा जो काफ़ी फायदेमंद रहा।
गरीब परिवार से संबंध रखने वाले संजीव कुमार ने पुलिस में सब इंस्पेक्टर बनकर आने माता-पिता सहित क्षेत्र का नाम रोशन किया है।
सब इंस्पेक्टर बने रविंद्र: आज रविंद्र प्रजापति बिहार पुलिस में सब इंस्पेक्टर हैं. पहली पोस्टिंग मुंगेर जिले में हुई है. रविद्र की सफलता से माता-पिता काफी खुश हैं, लेकिन जब संघर्ष की कहानी बताते हैं तो आंसू नहीं रोक पाते हैं.
मिट्टी के घर में बीता जीवन: गया जिले के कुईबार गांव में एक चमचमाता नया मकान है, इसके ठीक बगल में एक मिट्टी और छप्पड़ का घर है. इसी घर में रविंद्र के माता-पिता ने अपने बेटे की सफलता की सीढ़ी तैयार की. आज रविंद्र के कंधे पर डबल स्टार है. यह स्टार इनके माता-पिता के संघर्ष का तोहफा है.
माता-पिता दोनों मजदूरी की: सुगिया देवी रविंद्र की मां हैं, कहती हैं कि उन्होंने बेटा को अफसर की ठान ली थी. इसके लिए उन्होंने पति बंधन प्रजापति के साथ मजदूरी की और बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं होने दी. सुगिया देवी उन दिनों को याद कर रोने लगती हैं, जब बेटे की पढ़ाई के लिए मस्जिद निर्माण में मजदूरी करना पड़ा.
“एक समय आया जब मस्जिद निर्माण में मजदूरी करना पड़ा. मेरे पति मिट्टी खोदते थे और मैं मिट्टी निकाल कर उसे बाहर फेंकती थी. इस दौरान लोग ताना भी देते थे, लेकिन अपने बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं होने दी.” -सुगिया देवी, रविंद्र की मां
रविंद्र की मां कहती है, जब गया शहर में बेटा पढ़ाई करता था, उस समय आर्थिक स्थिति और खराब थी. रविद्र कहता था कि मां पढ़ाई के दौरान खाना बनाने में परेशानी होती है. घर से सत्तू भेज दीजिए, उसी से काम चल जाएगा. रविंद्र ने मक्के की रोटी, माड़-भात और सत्तू खाकर अपनी पढ़ाई पूरी की.
माता-पिता ने भी संघर्ष किया: ऐसा नहीं है कि सिर्फ रविंद्र सत्तू खाकर गुजारा करते थे. इनके माता-पिता कहते हैं कि जब बेटा वहां रहकर संघर्ष कर रहा था तो मैं कैसे अच्छा खाना खा लेता. बेटे के आने का इंतजार रहता था. जब रविंद्र शहर से घर आता था, उस समय घर में अच्छा खाना बनता था ताकि सभी लोग एक साथ खाएंगे.
लोगों के ताने सुने: माता-पिता के दुख तकलीफ और मेहनत को रविंद्र ने नजदीक से मसहूस किया. उन्होंने भी संघर्ष में कोई कसर नहीं छोड़ी. इसका रिजल्ट है कि रविंद्र पुलिस ऑफिसर बन गए. गांव के कुछ लोग ताना मारते थे कि ‘गरीब का बेटा क्या ही कर लेगा, एक दिन तो मजदूरी ही करनी है.’ आज वही लोग इनकी तारीफ कर रहे हैं.




